लेडी जर्नलिस्ट आरिफा जौहरी ने छेड़ी ‘खतना’ के खिलाफ जंग

आरिफा जौहरी (29) तब महज 7 साल की थीं, जब मुंबई के भेंडी बाजार स्थित एक इमारत में उन्हें एक महिला के पास ले जाया गया था। उनकी फ्रॉक उतार दी गई थी। आरिफा की मां ने कहा था कि उसके साथ ‘कुछ’ होगा और इसमें महज एक मिनट का वक्त लगेगा। इस तरह से आरिफा को खतने के लिए तैयार किया गया था। जैसी कि बोहरा समुदाय में परंपरा है। लेकिन अब पेशे से पत्रकार 29 वर्षीय आरिफा जौहरी ने बोहरा समुदाय की खतने की विवादास्पद परंपरा के खिलाफ कैंपेन शुरू कर दिया है।

खतने का विरोध करने वाले संगठन साहियो की संस्थापक जौहरी कहती हैं, ‘बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना किए जाने की परंपरा भयावह है। यह सिर्फ अफ्रीकी जनजातियों में किया जाता है। बोहरा समुदाय में माना जाता है कि वह सिर्फ स्किन का एक हिस्सा काट रहे हैं। लेकिन इसकी कोई वैज्ञानिक प्रक्रिया नहीं है, यह पता लगाने का कोई तरीका नहीं है कि किसी महिला के जननांग का कितना हिस्सा इसमें कट जाता है। आखिर वह इस प्रक्रिया को अंजाम देते ही क्यों हैं?’

वह याद करते हुए कहती हैं, ‘उस दौरान मेरी दोनों टांगों के बीच कुछ किया गया था। मैं रोई थी, मेरे दर्द हो रहा था।’ यही नहीं उसके बाद पेशाब करने के दौरान भी दर्द होता था। लेकिन वह समझ नहीं पाईं कि उनके साथ हुआ क्या था। आरिफा जौहरी कहती हैं, ‘बोहरा समुदाय में पुरुषों के अलावा महिलाओं का भी खतना किया जाता है। मुझे याद है कि लड़कों का खतना किए जाने की रस्म को एक उत्सव की तरह मनाया जाता है। हालांकि लड़कियों के खतने को इस तरह सेलिब्रेट नहीं किया जाता है। कई बार समुदाय और परिवार के लोगों को लंच जरूर दिया जाता है।’

कई साल पहले आरिफा जौहरी ने अपनी मां को एक मैगजीन दिखाई थी, जिसमें बोहरा समुदाय की महिलाओं के बारे में रिपोर्ट छपी थी कि वह ‘खतना’ के बारे में क्या सोचती हैं। इसके बाद दोनों मां-बेटियों ने इस रस्म के बारे में सोचना शुरू किया। कॉलेज में पढ़ाई के दौरान जौहरी के मन में नारीवादी विचारों का विकास हुआ। इसके बाद उन्होंने बोहरा समुदाय में खतना की परंपरा का अध्ययन करना शुरू किया। पश्चिम भारत में पाया जाने वाला दाऊदी बोहरा समुदाय खुद को यमन से जोड़ता है। इस समुदाय में पुरुषों एवं महिलाओं दोनों का खतना किए जाने की परंपरा है। महिलाओं के खतना की प्रक्रिया के तहत उनके जननांग के बाहरी हिस्से को काट दिया जाता है।

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