बीमारियों का शिकार होता किशोर

देश के महानगरों एवं बडे शहरों के बच्चे हाइपरटेंशन, मधुमेह और हृदय रोग जैसी बीमारियों के तेजी से शिकार हो रहे हैं। हाल के एक अध्ययन से पता चला है कि शहरों में रहने वाले करीब 25 प्रतिशत किशोर और युवा बच्चों को हृदय रोग का खतरा है।

पिछले कुछ सालों मे रहन सहन एवं खान पान की आदतों में बदलाव तथा स्थूल जीवन शैली और बढते तनाव के कारण शहरी बच्चों में मोटापा 20-25 प्रतिशत बढा है। नेशनल डायबिटीज, ओबेसिटी एवं कोलेस्ट्राल डिआर्डर फाउंडेशन एनडीओसीडी और अखिल भारतीय आयुर्विग्यान संस्थान एम्स द्वारा हाल में दिल्ली के 40 स्कूलों 14 साल से अधिक उम्र के बच्चों में कराए गए अध्ययन में पाया गया कि हानिकारक संतृप्त वसा उसके आहार का हिस्सा बन गए है।

एनडीओसी की प्रियाली शाह बताती है कि आजकल बच्चे जररत से चार गुना यादा वसा का सेवन कर रहे है। उन्होंने कहा कि आजकल पिजा, पास्ता, पैस्ट्री, बर्गर जैसे अधिक वसायुक्त खाद्य पदार्थ बच्चों के भोजन का मुख्य हिस्सा बन गये है। इसके अलावा आज के बच्चों में आधुनिक युग का तनाव भी बढ रहा है। हृदय रोग विशेषग्य तथा मेट्रो हास्पीटल एवं हार्ड इंस्टीच्यूट के निदेशक डा, पुरुषोत्तम लाल का कहना है कि आजकल किशोरों में भी हृदय रोग के संकेत मिलने लगे है।

देश के शहरी इलाकों में स्कूल जाने वाले बच्चों में खान-पान की खराब आदतों, तनावपूर्ण जीवन और बहुत अधिक टेलीविजन देखने और अधिक समय तक कम्प्यूटर से संबंधित गतिविधियों में संलग्न रहने, व्यायाम नहीं करने, आरामतलबी और सिगरेट एवं शराब के बढते सेवन के कारण हृदय रोग के खतरे बढ रहे है। चिकित्सकों का कहना है कि बच्चों में ये बीमारियां बढने के तीन मुख्य कारण जंक फुड का अधिक सेवन, टेलीविजन एवं कम्पयूटर से चिपके रहने की बढती प्रवृति और खेल-कूद तथा व्यायाम से कटना है।

देश के निजी स्कूलों में कम से कम 20 प्रतिशत बच्चों में मोटापा तथा हाइपरटेंशन पाया गया तथा उन्हें उन खतरों से ग्रस्त पाया गया जिनसे हृदय रोग हो सकते है। गत र्वाा देश के कुछ शहरों में किये गये एक अध्ययन में पाया गया कि खराब रहन-सहन, कम उम्र में धूम्रपान, विटामिन डी की कमी, मधुमेह आदि के कारण किशोर उम्र के बच्चों में भी हृदय रोग का खतरा बढ रहा है। किशोरों में हृदय रोग चिंताजनक है क्योंकि यह बुजुर्गावस्था की बीमारी मानी जाती है। एक अन्य अध्ययन में पाया गया है कि उत्तर भारत के युवाओं में कम उम्र में ही मेटाबोलिक डिसआर्डर की समस्या बढ रही है जिससे उनमें हृदय रोग का खतरा बढ रहा है।

डा. पुरुषोत्तम लाल ने कहा कि भारत में कम उम्र के लोगों और खास तौर पर बच्चों में हृदय रोगों में बढोत्तरी होने का एक चिंताजनक पहलू यह है कि जहां अमरीका में 10 साल के उम्र से ही बच्चों की हृदय रोग संबंधित स्कैनिंग शुर हो जाती है वहीं भारत में मध्यम उम्र का व्यक्ति भी हृदय रोग की जांच,,पडताल नहीं करता। जबकि मौजूदा स्थिति को देखते हुए बच्चों की जल्द से जल्द खासकर पारिवारिक इतिहास होने पर स्कैनिंग जररी है ताकि जररत पडने पर रोकथाम के उपाय किये जा सकें। हृदय रोगों की तरह उच्च रक्तचाप की समस्या भी बच्चों में तेजी से बढती जा रही है। उच्च रक्त चापहाई ब्लड प्रेशन को आमतौर पर नजरंदाज कर दिया जाता है, लेकिन यह बीमारी जानलेवा साबित हो सकती है। यह बीमारी हृदय रोगों एवं दिल के दौरे का सबसे प्रमुख कारण है।

यहां स्थित इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के वरिष्ठ इंटरनल मेडिसीन विशेषग्य डा. राकेश कुमार बताते है कि उच्च रक्त चाप से ग्रस्त यादातर लोगों को मधुमेह होने तथा उनके कालेस्ट्राल में वृद्धि होने की आशंका होती है। उच्च रक्त चाप के जिन मरीजों का मधुमेह के साथ,,साथ कालेस्ट्राल भी बढा होता है उन्हें कार्डियोवैस्कुलर बीमारियां होने की आशंका कई गुना बढ जाती है। एशियन इंस्टीच्यूट आफ मेडिकल साइंसेस के प्रमुख नेप्रोलाजिस्ट डा. जितेन्द्र कुमार का कहना है कि अब रक्त चाप सिर्फ वयस्कों की बीमारी नहीं रही बल्कि अब बच्चे और किशोर भी इससे प्रभावित हो रहे है। यहां तक कि कुछ शिशुओं में भी उच्च रक्तचाप पाया गया है।

वह बताते है कि 10 साल के उम्र के बच्चों में उच्च रक्तचाप का कारण समयपूर्व जन्म बच्चे का कम विकास और किडनी की समस्या होती है लेकिन 10 साल से अधिक उम्र के बच्चों में इसका कारण अधिक वजन, अत्याधिक वसा और नकम का सेवन तथा व्यायाम की कमी जैसी जीवन शैली से जुडी समस्याएं है। उन्होंने कहा है कि बच्चों या किशोरों में उच्च रक्त चाप का इलाज नहीं कराने पर यह हृदय रोग, स्ट्रोक और किडनी फेलियर जैसी गंभीर समस्याएं पैदा कर सकती है। उच्च रक्तचाप को दवाइयों और जीवन शैली में परिवर्तन कर नियंत्रित रखा जा सकता है। डा. पुरुषोत्तम लाल के अनुसार भारत में युवा बच्चों में पाये जाने वाले हृदय रोगों में एथेरोस्क्लेरोसिस मुख्य है।

इसमें धमनी की दीवारें कालेस्टेराल जैसे वसीय पदार्थो के निर्माण में मोटी हो जाती है। वसायुक्त जंक फूड का अधिक सेवन करने वाले बच्चे इसके प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते है। कोलेस्ट्राल प्लाक बहुत तेजी से बढने वाली प्रयिा है और यह यहां तक कि बाल्यावस्था में ही शुर हो सकती है। इसके अलावा कावासाकी रोग और रह्युमेटिक बुखार जैसी बीमारियां भी बच्चों में हृदय रोग के लिए जिम्मेदार है। रह्यमेटिक बुखास में सामान्य वायरल संमण जैसे लक्षण ही होते है लेकिन यह हृदय की धमनियों में सूजन पैदा कर हृदय को प्रभावित करता है। रह्युमेटिक बुखार के रोगियों में अक्सर उनके हृदय की मांसपेशियों में सूजन होती है।

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