पहली स्टेज में महिलाएं इस तरह पहचाने गर्भाशय का कैंसर

भारत में गर्भाशय कैंसर की बीमारी महिलाओं को सबसे अधिक प्रभावित करती है। महिलाओं में होने वाले गर्भाशय के कैंसर को एंडोमेट्रिअल कार्सिनोमा कहते हैं। इसमें गर्भाशय की स्वस्थ कोशिकाएं अनियमित रूप से वृद्धि करके गांठ का रूप लेने लगती हैं जिनके कैंसरग्रस्त होने की आशंका बढ़ती है। अन्य प्रकार के कैंसर की तुलना में इसके मामले अधिक होते हैं। 75 फीसदी महिलाओं में मेनोपॉज के बाद और 10 प्रतिशत मामलों में 40 वर्ष से कम उम्र में यह हो सकता है। यदि शुरूआती अवस्था में कैंसर की पहचान हो जाती है तो उपचार आसान हो जाता है।

◆ लक्षण : पहली स्टेज में इस तरह पहचानें गर्भाशय का कैंसर असामान्य रूप से जननांग से ब्लीिंडग या डिस्चार्ज, कुछ महिलाओं में मेनोपॉज से पहले या बाद में भी असामान्य रूप से रक्तस्त्राव होना। पेशाब के दौरान परेशानी व दर्द होना, पेट के निचले हिस्से और कूल्हों के आसपास दर्द बने रहना जैसी परेशानियां होने लगती हैं।

◆ कारण : अधिक वजन, आनुवांशिकता, डायबिटीज या उच्च रक्तचाप से पीडित महिलाओं को गर्भाशय का खतरा बढ़ जाता है। संतानहीन महिलाओं , 55 साल की उम्र में मेनोपॉज हो, स्तन कैंसर के इलाज के लिए टेमॉक्सिफेन दवा ले रही हों या जो पीसीओएस से पीडित हो, उनमें भी इसकी आशंका रहती है।

◆ रोग का संक्रमण : गर्भाशय में गांठ (टयूमर) बनने से इसकी शुरुआत होती है। अधिकांश मामलों में इस कैंसर की पहचान पहली स्टेज में ही हो जाती है। इस स्टेज में इलाज संभव है। लेकिन धीरे-धीरे टयूमर का फैलाव गर्भाशय के बाहर आसपास के अंगों की कोशिकाओं में होने लगता है। इसमें फेफड़े, लिवर, दिमाग, हड्डियां व जननांग शामिल हैं।

◆ कैसे की जा सकती है बीमारी की जांच : गर्भाशय कैंसर की जांच तीन स्तर पर की जा सकती है। पहला अल्ट्रासोनोग्राफी कर गांठ की मोटाई का पता लगाते हैं। दूसरा गांठ चार एमएम से ज्यादा मोटाई (मेनोपॉज के बाद) की हो तो एंडोमेट्रिअल बायोप्सी करते हैं। एडवांस्ड स्टेज में कैंसरग्रस्त गांठ सुनिश्चित होने पर एमआरआई और सीटी स्कैन कर टयूमर के आकार और फैलाव को जांचते हैं।

◆ उपचार : प्रथम अवस्था में सर्जरी के द्वारा उपचार किया जाता है। अधिक वजन या रोग से पीडित हैं तो रोबोटिक सर्जरी व लेप्रोस्कोपी करते हैं। रेडिएशन, कीमोथैरेपी और हार्मोन थैरेपी देते है। खुद को एक्टिव बनाए रखना जरूरी है। इसके लिए भोजन में सब्जियां व फल खाएं। शारीरिक रूप से सक्रिय बने रहना चाहिए। बाजार के खाद्य पदार्थों से परहेज करें।

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