जब बच्चा मना करें स्कूल जाने तो कारण अवश्य जाने

गर्मी और बरसात की छुट्टियों के बाद जब छोटे बच्चे स्कूल जाते हैं तो पहली बार स्कूल जाने वाले बच्चे बहुत रोने-धोने लगते हैं। कुछ बच्चे कुछ दिनों तक स्कूल जाने में बहुत आना-कानी करते हैं और फिर कुछ दिनों के बाद सामान्य रूप से स्कूल जाने लगते हैं। लेकिन कुछ छोटे बच्चे एक-दो महीने के बाद भी स्कूल जाने में बहुत रोते-धोते हैं।

जब बच्चे स्कूल जाने से जी चुराते हैं तो उनके पीछे कुछ विशेष कारण हो सकते हैं। प्रारम्भ में स्कूल जाते समय बच्चे का आना-कानी करना, नहीं जाने की जिद करना स्वाभाविक हो सकता है लेकिन कुछ दिनों बाद या कुछ महीनों बाद स्कूल जाने से जी चुराना तो अवश्य कोई गड़बड़ हो सकती है। ऐसी स्थिति में बच्चे से बड़े प्यार-दुलार से स्कूल नहीं जाने का कारण पता करना चाहिए। यदि बच्चे से कुछ पता नहीं चले तो उसके स्कूल जाकर टीचर से बातें करके उस गड़बड़ का पता लगा सकते हैं।

बच्चे के स्कूल जाने से जी चुराने के अनेक छोटे-छोटे कारण हो सकते हैं। आजकल अधिकांश स्कूलों में बच्चे बस या मिनी बस से जाते हैं। बच्चे को स्कूल की बस में बैठाते समय बस के हैल्पर का व्यवहार देखें। कुछ हैल्पर बच्चों को खींचकर बस में चढ़ाते और उतारते हैं। खींचकर बच्चे को बस में चढ़ाया जाता है तो उसे तकलीफ होती है। ऐसी स्थिति में बच्चे स्कूल बस में जाने से कतराने लगते हैं।

छोटे बच्चे स्कूल जाते समय बहुत अकेलापन अनुभव करते हैं। जब बस में बड़ी क्लासों के बच्चे साथ जाते हैं तो छोटे बच्चों को बस में सीट नहीं मिलती। बस चलने पर बच्चे इधर-उधर गिरने लगते हैं या किसी मोड़ पर गिर जाते हैं तो चोट लगने से रोने लगते हैं। ऐसी स्थिति में बच्चे अपने को बहुत अकेला अनुभव करते हैं और अकेले जाने से भयभीत होने लगते हैं।

छोटे बच्चे स्कूल बस में बैठते समय अपने को माता-पिता से अलग होने से डर जाते हैं। ऐसे समय बच्चे को प्यार से स्कूल बस में बैठाना चाहिए। बस में कोई टीचर हो तो उससे बच्चे को ध्यान रखने के लिए कह सकते हैं। टीचर के प्यार से बच्चे का बहुत-सा डर दूर हो जाता है और वह खुशी-खुशी स्कूल जाता है। बच्चे को खुशी-खुशी स्कूल भेजने के लिए उसे बस में बैठाते समय दोपहर को उसके लौटने पर फिर मिलने की बात कहें तो बच्चा बहुत खुश रहेगा। वह अपने को अकेला अनुभव नहीं करेगा। आपका आश्वासन बच्चे को उत्साहित करेगा।

बच्चे स्कूल में बहुत जल्दी दूसरे बच्चों से घुल-मिल जाते हैं। कक्षा में किसी एक बच्चे से उनकी दोस्ती भी हो जाती है। कक्षा या गार्डन में खेलते-कूदते समय किसी बच्चे से बच्चे की टक्कर भी हो सकती है। पैंसिल या किसी दूसरी चीज के लिए बच्चे लड़ भी सकते हैं। ऐसी स्थिति में अध्यापक को दोनों बच्चों को समझाना चाहिए। यदि अध्यापक दोनों बच्चों को नहीं समझाता तो मार खाने वाले बच्चे के मन में डर घर कर जाता है और वह अगले दिन स्कूल जाने से इनकार करने लगता है। बच्चे स्कूल नहीं जाने का कारण जानकर उसके अध्यापक से मिलकर इस समस्या को हल किया जा सकता है।

कुछ बच्चे बहुत शरारती होते हैं। किसी शरारत करने से या किसी बच्चे से लडने पर अध्यापक उसे डांट देते हैं तो बच्चे बुरी तरह डर जाते हैं। अध्यापक का क्रोध किसी बच्चे को इतना भयभीत कर देता है कि बच्चा स्कूल जाने से इनकार करने लगता है। अध्यापक से भयभीत बच्चा कभी पेट दर्द का बहाना बनाता है तो कभी दांत दर्द का। ऐसी स्थिति में बच्चे से प्यार का व्यवहार करके उसके अध्यापक से मिलकर बच्चे के मन से भय को दूर कर सकते हैं। प्यार-दुलार के व्यवहार से अध्यापक ही नहीं, माता-पिता भी बच्चे को अपना मित्र बनाकर उसे उत्साहित करके सुयोग्य व निपुण छात्र बना सकते हैं।

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