जातक व प्रश्न कुण्डली की शाखाएं है अलग लेकिन मकसद है एक

पारम्परिक ज्योतिष में कुण्डली देखने का विधान है, जो प्रमुख दो शाखाओं में विभाजित किया गया है। पहले स्थान पर है जातक कुण्डली और दूसरे स्थान पर है प्रश्न कुण्डली। इससे आगे यह बहुत सी विभिन्न शाखाओं में विभाजित हो जाता है। प्राचीन समय में सामुद्रिक शास्त्र को जातक कुण्डली के साथ ही देखा जाता था अर्थात जातक के शरीर के अंगों के लक्षणों का मिलान उसकी राशि, ग्रह और दशा के अनुरूप देखने की परम्परा रही है।

रमल पद्धति प्रश्न कुण्डली की ही एक शाखा है। जिसमें पासे प्रश्रों के उत्तर देने का प्रयत्न करते हैं। हस्तरेखा सामुद्रिक की ही एक शाखा है।

टैरो कार्ड भारतीय पद्धति की नहीं बल्कि पश्चिमी पद्धति की देन है। इस पद्धति में टैरो कार्ड (जो ताश के पत्तों की तरह दिखाई देते हैं मगर उनकी अपनी एक अलग ही भाषा होती है) के द्वारा जातक से उसके प्रश्रों के संबंध में संकेत लिए जाते हैं और ज्योतिषी अपनी गणना के आधार पर जातक को उसके प्रश्रों के उत्तर देता है। इसमें गणित का भाग नहीं होता और इसका सर्वस्व गणना पर आधारित होता है।

वास्तुशास्त्र भूमि, घर, दुकान और उनके भीतर मौजूद सामान का विशलेषण करता है और उन्हें निश्चित क्रम में रखे जाने की हिदायत दी जाती है मगर यह ज्योतिष की शाखा नहीं है। जब ज्योतिषीय गणना की जाती है तो जातक के अच्छे व बुरे समय को ध्यान में रखते हुए इन्हें उपचारों के रूप में इस्तेमाल में लाया जाता है। मूल ज्योतिष टोने-टोटकों को नहीं मानता।

टैरो कार्ड की तरह ही अंक विद्या भी पश्चिम सभ्यता की देन है। अंकों की बारम्बारता के आधार पर अंक ज्योतिषी जातक को यह बताने का प्रयास करता है कि कौन से अंक उसके लिए अच्छे अथवा बुरे हैं। इसमें कोई लॉजिक नहीं होता। एक से नौ तक की संख्या के आधार पर इन्हें एक-एक ग्रह भी दे दिया गया है, मगर यह पारम्परिक भारतीय ज्योतिष से बिल्कुल भिन्न है।

फेंगशुई पूर्व की ही विद्या है और यह चीनी सभ्यता की देन है। वहां पर इसे बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। वास्तु दोष को दूर करने के लिए चीनी लोग फेंगशुई का सहारा लेते हैं। यही नहीं बल्कि दैनिक कार्य-कलापों के रूप में आईचिंग से लोग ये जानने का प्रयत्न करते हैं कि आज का दिन कैसा होगा?

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