कैंसर को दूर भगाना है तो बने शाकाहारी

दुनिया भर में बीमारी से होने वाली मौतों में सबसे अधिक मौत कैंसर की वजह से होती है। हालांकि यह बीमारी लाइलाज नही है लेकिन मरीज को इसका उपचार कराने में अपेक्षाकृत खर्च अधिक लगता है। यदि कैंसर के शरीर को अधिक प्रभावित करने से पहले यानी समय पर इलाज की सुविधा और बीमारी की जानकारी मिल जाती है तो मरीज की जान को बचाया जाना आसान हो जाता है।

भारत में कैंसर के बारे में अधिकतर अनुसंधान अमेरिका से प्रेरित होता है। हमारे बड़े से बड़े मेडिकल और अनुसंधान संस्थान, अमेरिका में हुए अनुसधान को ही आधार मानकर आगे बढते हैं। या कहा जाय तो हम कैंसर के इलाज के लिए अमेरिका के विशेषज्ञों पर निर्भर हैं। अमेरिका का नेशनल कैंसर संस्थान कैंसर पर अनुसंधान के लिए प्रतिदिन तकरीबन तीस लाख डॉलर खर्च करता है।

अमेरिकन कैंसर सोसाइटी रोज दस लाख डॉलर कैंसर के इलाज के अनुसंधान पर खर्च करती है। इसके बावजूद कैंसर के आम मामलों से होने वाली मौत जैसे फेफड़ों, आंत, ब्रेस्ट, प्रॉस्टेट, अंडाशय और पैंक्रियाज कैंसर का आंकड़ा पिछले पचास सालों से बढ़ ही रहा है। ‘हर तीस सेकेंड में एक अमेरिकी नागरिक को कैंसर होने का पता चल रहा है। हर 55 सेकेंड पर एक अमेरिकी की कैंसर से मौत हो रही है।

कैंसर से बचाव –

दूसरा तरीका है कैंसर से बचाव का अमेरिकी सीनेट की नेशनल कमेटी ऑफ न्यूट्रिशन ऐंड ह्यूमन नीड्स ने नेशनल कैंसर इंस्टीटयूट के निदेशक से पूछा था कि खान-पान से कितने कैंसर होते हैं? निदेशक ने जवाब दिया कि पचास फीसद लोग खान-पान की वजह से कैंसर के शिकार होते हैं। फिर सीनेट की कमेटी ने जानना चाहा था कि खान-पान की कौन सी वजहें हैं जो लोगों को कैंसर का शिकार बनाती हैं? क्या वो केमिकल एडिटिव्स हैं? खाने के प्रिजर्वेटिव यानी संरक्षक केमिकल या फिर बनावटी रंग? निदेशक ने इन सवालों के जवाब में कहा-नहीं इनमें से कोई भी कैंसर के प्रमुख कारक नहीं हैं।

नेशनल कैंसर इंस्टीटयूट के डॉक्टर जियो बी गोरी ने कहा था कि खान-पान से कैंसर की प्रमुख वजह हैं खाने में मीट और फैट का ज्यादा इस्तेमाल। इसी तरह अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में न्यूट्रिशन के वैज्ञानिक भी मांस, डेयरी प्रोडक्ट और अंडों के उद्योग को कई तरह के कैंसर के लिए जिम्मेदार मानते हैं। इनसे सबसे ज्यादा ब्रेस्ट और आंत के कैंसर होते हैं। अमेरिका के नेशनल कैंसर इंस्टीटयूट का जर्नल कहता है कि दुनिया में ऐसा कोई समुदाय नहीं जो बहुत मांस खाता है उस समुदाय पर कैंसर का कहर न बरपा हो।

‘जापानियों पर हुआ एक रिसर्च बताता है कि जापान में रहने वाले जापानी नागरिक कम मांस खाते हैं। उनमें आंत के कैंसर की बीमारी कम देखी गई। वहीं जो जापानी नागरिक अमेरिका में बस गए, उन्होंने ज्यादा मांस खाना शुरू किया तो उनके बीच आंतों का कैंसर ज्यादा होने लगा।’इस बारे में आगे हुए रिसर्च से दो और प्रमुख बाते सामने आईं-लोग जितना ही फैट खाते हैं, उतना ही उन्हें आंत का कैंसर होने का खतरा बढ़ता जाता है। लोगों के खाने में जितना ही रेशेदार खाना कम होगा, उतना ही उसे आंत का कैंसर होने की आशंका बढ़ती जाएगी। मांस, अंडे और ज्यादातर डेयरी प्रोडक्ट यानी दूध से बने उत्पादों में फैट बहुत होता है। इनमें फाइबर न के बराबर होता है।

फाइबर नहीं खाने से होता है कैंसर हमारे खाने में फाइबर का क्या काम है? ये एनिमल फैट से होने वाले नुकसान से हमें बचाते हैं। ये रेशेदार चीजें झाड़ू का काम करती हैं जो हमारी आंतों से गंदगी साफ कर देते हैं। एनिमल फैट, शरीर के तापमान के अंदर ठोस रूप में रहते हैं। ऐसे में खाने में रेशेदार चीजें नहीं हैं तो ये ठोस फैट हमारी आंतों का रास्ता रोक लेता है।

इस वजह से खाना पचने में समय लगता है। छोटी आंत से बड़ी आंत तक खाना जाने में और भी वक्त लगता है। जितना ही समय खाना हमारी आंत में गुजरता है, उतना ही हमारी आंतों को खाने को पचाने में मेहनत करनी पड़ती है। खाने में मौजूद नुकसानदेह चीजें जो खाना पचने की प्रक्रिया के दौरान शरीर से बाहर हो जानी चाहिए, वो शरीर में ही रह जाती हैं। वैसे भी बड़ी आंत मांस के पचने के लिहाज से काफी बड़ी होती है। मांस खाने वाले ज्यादातर जानवरों की बड़ी आंत उनके लिए मुफीद होती है।

मगर हम इंसानों के अंदर बड़ी आंत शाकाहारी जानवरों जैसी होती है। सवाल ये है कि इन खाने की चीजों में कितना फाइबर है? बीफ, स्टीक, लैम्ब चॉप, पोर्क चॉप, चिकेन, फिश, चीज, दूध और अंडों में फाइबर न के बराबर होता है। जबकि कमोबेश सभी सब्जियों और अनाजों में फाइबर होता है। किसी में कम और किसी में ज्यादा। सिर्फ सफेद चावल में रेशे नहीं होते। भारतीय शहरों में बढ़ा है कैंसर भारत के शहरों में रहने वाले लोगों के बीच मांस खाने वालों की तादाद ज्यादा है। सवाल ये है कि इनके बीच आंत का कैंसर होने का आंकड़ा क्या कहता है?

महिलाओं की अपेक्षा पुरूााों में कैंसर का खतरा अधिक-

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने 1990 से 1996 के बीच पांच शहरों और एक ग्रामीण इलाके में रिसर्च की थी। इसके नतीजे कुछ इस तरह हैं। आंतों के कैंसर के मरीजों की तादाद बढ़ रही है। मर्दों में औरतों के मुकाबले कैंसर होने की आशंका डेढ़ गुना ज्यादा है। महिलाओं में होने वाले कैंसर में आंतो का कैंसर दसवें नंबर पर है। आंतों के कैंसर की बीमारी तेजी से बढ़ रही है। मुंबई में आंतों का कैंसर होने की दर सबसे अधिक है। एक ही अस्पताल में 845 मर्दों और 623 औरतों में कैंसर देखा गया। जहां एक अस्पताल में 543 आदमियों और 357 औरतों में कैंसर की बीमारी देखी गई।

‘बैंगलोर, भोपाल में भी कैंसर की बीमारी तेजी से बढ़ती देखी जा रही है। इनके मुकाबले जिस ग्रामीण इलाके बारशी में रिसर्च की गई वहां पर कैंसर के केवल 9 मामले देखे गए।’सबसे दिक्कत तलब और आपके लिए खास तौर से सोचने बात ये है कि कैंसर के अधिकतर शिकार लोग तीस बरस की उम्र के बाद के होते हैं। तीस साल की उम्र के बाद बुरे खान-पान का असर हमारे शरीर पर दिखने लगता है। महिलाओं में कैंसर के दो फीसद और मर्दों में चार फीसद मामले आंतो के कैंसर के होते हैं। देश भर में कैंसर के मरीजों के आंकड़ों पर गौर करें तो 1990-91 में ये 3.44 लाख आदमियों और 3.88 लाख औरतों का था। कैंसर के शिकार लोगों की औसत उम्र केवल तीन बरस बचती है। कैंसर की इस भयानक बीमारी से बड़ी आसानी से निपटा जा सकता है।

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