बॉलीवुड को लुभा रहा है झारखंड का ये सौंदर्य स्थल..!!

प्राकृतिक सौंदर्य में धनी है झारखंड

जी हां आजकल बॉलीवुड सिनेमा जगत भी अब झारखंड की ओर रूख किया है। झारखंड के ये सौंदर्य स्थल अब पूरी दुनिया देखेगीं। वन की भूमि झारखंड, जो पारिस्थितिकी पर्यटकों को अपने अवकाश का आनंद लेने के इच्छुक लोगों को प्राकृतिक रूप से आकर्षित करता है। प्राकृतिक सौंदर्य में धनी, झारखंड, यात्रियों को अन्य गतिविधियां जैसे विविध वनस्पति और घने जंगलों के बारे में, झरने का भ्रमण, कई सुंदर पहाड़ियों के अन्वेषण, खेल आदि की सुविधा देता है। यहां देखने के लिए प्रसिद्ध राष्ट्रीय पार्क और दर्शनीय स्थल भी है।

बेतला राष्ट्रीय उद्यान : इस उद्यान को बेतला वन घोषित किया गया है और यह 753 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में है। यह वन केच्की से शुरू होता है और नेतरहाट तक बढा हुआ है। वन में 970 प्रजाति के पौधे, 174 प्रजातियों के पक्षी, 39 स्तनधारी, 180 प्रजाति के औषधीय पौधे पाए जाते हैं।

सारंडा के जंगल : यहां कई अन्य पुराने मंदिर हैं, यह ‘700 ‘ पहाड़ों का घर और यहां भव्य साल वन है। सारंडा वन एशिया का सबसे बड़ा और घना वन है जिसमे फ्लाइंग छिपकली, रेंगनेवाला कीडा है।यह माना जाता है कि इसके कुछ हिस्से इतने घने है कि सूर्य के प्रकाश भी पार नहीं कर सकते हैं। यह वन साहसिक पारिस्थितिकी उत्साही यात्री के लिए बड़े आनन्द की जगह है।

तिलैया डैम : यह पहला बांध है जिस पर पन बिजली पावर स्टेशन का निर्माण दामोदर घाटी निगम द्वारा बराकर नदी पर बनाया गया है जो हजारीबाग जिले में है। यह 1.200 फुट लंबा और 99 फुट उंचा है। यह 36 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में एक आदर्श जलाशय के आसपास स्थित है। इसका मुख्य उद्देश्य बाढ़ नियंत्रण करना है। इस पन बिजली स्टेशन से 4.000 किलो वाट बिजली का उत्पादन करता है। पर्यटकों को इसके आसपास का खूबसूरत प्राकृतिक वातावरण आकर्षित करता हैं।

डिमना लेक : जमशेदपुर से 13 किमी की दूरी पर स्थित है। फूल-पत्ती और पहाडों से घिरा 60 फीट गहरा एक मनमोहक लेक है।यहां पर्यटकों के लिए बोटिंग की सुविधा भी है।

जुबली पार्क : टाटा आयरन एंड स्टील कम्पनी के संस्थापक जमशेदजी नौशेरवानजी टाटा की स्मृति में इस भव्य पार्क का निर्माण किया गया। यह छोटे रूप में कर्नाटक राज्य में स्थित प्रसिद्ध वृंदावन गार्डन जैसा है। यहां सैकड़ों किस्म के गुलाब सहित तरह-तरह के फूलों की बहार और कई-कई दुर्लभ प्रजातियों के पेड़ों की हरियाली का नजारा पर्यटकों को आकर्षित करता है। पानी के रंग-बिरंगे फव्वारे, कृत्रिम झरने और करीब 40 एकड़ में पफैली झील और झील के बीच में पानी का उफंचा फव्वारा! शाम होते ही जुबली पार्क का दृश्य बदल जाता है। बिजली की रंग-बिरंगी रोशनियों का जादू जैसे जमीन के छोटे से टुकड़े पर स्वर्ग को उतार लाता है। जुबली झील में नौका-विहार का आनंद लिया जा सकता है। झील के साथ ही जुड़ा है बोटहाउसनुमा जलपान गृह। हर साल तीन मार्च के दिन जमशेदजी टाटा के जन्म दिन के अवसर पर पूरा जमशेदपुर जश्न मनाता है।

रांची झील (बड़ा तालाब) : रांची के केंद्र में स्थित रांची झील की खुदाई एक ब्रिटिश एजेंट कर्नल ओंसेली के द्वारा वर्ष 1842 में की गई थी। यह सुंदर झील रांची हिल (बड़ा तालाब) के नीचे स्थित है। यह झील लगभग शहर के मध्य में स्थित है। रांची झील पर्यटकों को जल के सौंदर्य को अनुभव करने का उत्कृष्ट अवसर प्रदान करता है, क्योंकि यहां नौका विहार की भी सुविधा है।

पलामू फोर्ट : पलामू किला के बारे में कहा जाता है कि वहां के चेरों के राजा मेदनीराय ने अपने पुत्र प्रतापराय के लिए इस किले का निर्माण करवाया था। इसकी नीव 1532 में पड़ी थी। इसका सबसे अधिक आकर्षक पक्ष इसका दरवाजा है, जिसे नागपुरी शैली का दरवाजा कहा जाता है। इस दरवाजे की ऊंचाई 40 फीट तथा चौडाई 15 फीट है।पलामू जिले के कई लोकगीतों में इसकी विशालता का वर्णन किया गया था। पलामू किला से 2 किलोमीटर की दूरी पर कमलदह झील का किला है जो मेदनीराय की रानी का था। उन्हें प्रकृति से बहुत प्यार था, लेकिन वहीँ पर स्थित तालाब में जब वह स्नान करने गयी तो डूब गयी थी, जिसे चेरो जनजाति इसे जादू मानते थे।

बैजनाथ धाम मंदिर : झारखंड का महाकुंभ कहा जाने वाला देवघर भारत में हिंदुओं की एक पवित्र नगरी के रूप में प्रसिद्ध है। प्रति वर्ष यहां लगने वाला श्रावणी मेला विश्र्व प्रसिद्ध है। धर्म और देवताओं के शहर देवघर को बाबा वैद्यनाथ की नगरी भी कहा जाता है। 12 ज्योतिर्लिगों में से एक, यहां प्रसिद्ध बाबा वैद्यनाथ का ऐतिहासिक ज्योतिर्लिग है, जिसमें प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं। प्रति वर्ष श्रावण मास में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु कम से कम 110 किमी की पैदल यात्रा कर बाबा वैद्यनाथ को जल अर्पण करते हैं। कांवरिए जन बिहार प्रांत के सुलतानगंज स्थिथ उत्तरवाहिनी सुरनदी गंगा का जल लेकर बाबा वैद्यनाथ का जलाभिषेक करते हैं। इस पवित्र नगरी के आसपास हजारों धार्मिक महत्व के नजारे देखने को मिलते हैं। पर्यटक विशेष रूप से यहां सत्संग आश्रम, त्रिकुटी, नौलखा मंदिर का भ्रमण करते है।

रांची पहाड़ी मंदिर : रांची में, रांची पहाड़ी की ऊंचाई पर मंदिर है, जो वहां के स्थानीय लोगों के लिए पहाड़ी, पहाड़ी मंदिर के नाम से जाना जाता है। सामान्यतः यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। लेकिन प्रत्येक स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस पर मंदिर के उपरी छोर पर राष्ट्रीय तिरंगा फहराया जाता है जो उन लोगों के सम्मान की दिशा में किया जाता है जिन्होंने स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान अपने प्राणों का बलिदान दिया था।बहुत से स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में कहा गया है की उन्हें यहां फाँसी दी गयी है। जब देश स्वतंत्र हुआ तो रांची के वासियों ने फैसला किया कि उन शहीदों को सम्मान देने के लिए पहाड़ी पर तिरंगा फहराया जायेगा और इसी तरह परंपरा चली आ रही है और यह वास्तव में इस मंदिर की अलग पहचान है

छिन्नमस्तिका मंदिर: रांची से करीब 80 किलोमीटर दूर रामगढ -बोकारो मार्ग यानि की रजरप्पा में पर अवस्थित माँ छिन्नमस्तिका का मंदिर यहां अवस्थित है, जो देश भर में प्रसिद्ध है।पुराने मंदिर में सिरविहीन देवी कामदेव के शरीरपर खड़ी हुई और रति कमल के आसन पर विराजमान हैं। मन्नत मांगने व पुरे होने पर पुनः दर्शन करने यहां भक्त काफी संख्या में पहुचते हैं। सभी भगवान शिव के भक्तों का देवघर के महा श्रावणी मेला में स्वागत हैं, जो भगवान शिव का पवित्र स्थान है। श्रद्धालु सुल्तानगंज में उत्तर वाहिनी गंगा में डुबकी लगाने के बाद गंगा का पवित्र जल कांवर में लेकर, नंगे पांव 105 किलोमीटर की दूरी तय कर के देवघर जाते हैं।

जगन्नाथपुर मंदिर : उड़ीसा की स्थापत्य कला पर निर्मित यह मंदिर झारखंड के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। पहाड़ी पर स्थित मंदिर को देखकर ऐसा प्रतीत होता है की काफी ऊंचाई पर मणि एक किला विद्यमान हो। जून-जुलाई में यहां रथयात्रा के अवसर पर विशाल मेला लगता है। नागवंशी राजा ठाकुर एनी शाहदेव द्वारा 1691 में रांची से 12 किलोमीटर की दूरी पर इस मंदिर का निर्माण कराया गया था। मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा की मूर्तियां मौजूद हैं।

सूर्य मंदिर : रांची से 39 किलोमीटर की दूरी पर रांची -टाटा रोड पर स्थित यह मंदिर बुंडू के समीप है। संगमरमर से निर्मित इस मंदिर का निर्माण 18 पहियों और 7 घोड़ों के रथ पर विद्यमान भगवान सूर्य के रूप में किया गाया है। 25 जनवरी को टुसू मेला के अवसर पर यहां विशेष मेले का आयोजन होता है। श्रधालुओं के विश्राम के लिए यहां एक धर्मशाला का निर्माण भी किया गया है।

अंगराबाड़ी : रांची से 40 किलोमीटर दूर खूंटी के समीप स्थित यह मंदिर भगवान गणेश, राम-सीता, हनुमान और शिव के प्रति समर्पित है।

पारसनाथ पहाड़ : झारखंड का सबसे उंचा पठार, जिसकी ऊंचाई समुद्रतल से 4480 फीट है। यहां के मंदिर को जैनियों का सबसे पूज्य व पवित्र स्थान माना गया है। जैन मान्यता के अनुसार 24 तीर्थकरों में से 20 को मोक्ष की प्राप्ति यहीं हुई है। यहां जाने के लिए आपको रांची से ट्रेन मार्ग जाने पर पारसनाथ स्टेशन में उतरना होगा या फिर बस से गिरिडीह में उतार सकते है।

झारखंड की रानी नेतरहाट : राजधानी रांची से 144 किमी की दूरी पर स्थित नेतरहाट वस्तुत: पठार पर स्थित है। नेतरहाट झारखंड की मसूरी के रूप में विख्यात है। यहां अप्रतिम प्राकृतिक सौंदर्य बिखरा पड़ा है। यहां का सूर्योदय देखने के लिए दूर-दूर से पर्यटक आते हैं। यहां पर आपको घने जंगलों, उच्चे पर्वत शिखर घुमावदार सड़कों, झरनो, ठंडी हवाओं का अद्भुत संगम दिखाई देता है। यहां की चांदनी रात पर्यटकों को बहुत लुभाती है। अगर आप नेतरहाट आना चाहते हैं तो आपको सर्वप्रथम ट्रेन या हवाई जहाज से रांची आना पड़ेगा। यहां से आप बस द्वारा नेतरहाट जा सकते हैं। आपको यहां ठहरने के लिए प्रभात विहार, पालम डाक बंगलों, फारेस्ट रेस्ट हाऊस और अन्य प्राइवेट होटलों में स्थान मिल जाएगा। मंगोलिया प्वाइंट जो नेतरहाट से सिर्फ दस किमी दूर है आप यहां आकर डूबते हुए सूरज का नजारा देख सकते हैं, जो अवर्णनीय है। यहां के अपर गंगोत्री एवं लोअर गंगोत्री नामक झरना अपनी सुंदरता के लिए विख्यात है। व्यू प्वाइंट से आप कोयल नदी का विहंगम दृश्य भी देख सकते हैं।

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