‘काम की तलाश’ में फंस गई ‘बदनाम’ गलियों में

वेश्यालय, सेक्स वर्कर्स को ज्यादातर लोग गंदी निगाहों से देखते हैं। ऐसे लोगों में से ज्यादातर लोग कभी वहांपर गए भी नहीं होते। तो चलिए ऐसे लोगों की सोच को बदलने के लिए आप भी हमारा साथ दीजिए और वेश्यालय को हेजल थॉमसन के नजरिए से देखिए। इन्होंने अपनी जिंदगी का बेहद कीमती वक्त वेश्यालयों को समझने के लिए दिया है।

हेजल थॉमसन नाम की एक ब्रिटिश फोटोग्राफर और पत्रकार भारत के वेश्यालयों पर डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाने आई थीं। वह यहां पूरे 10 साल तक रहीं। इसके लिए वह अंग्रेजों के वक्त बने मुंबई के कमाठीपुरा में गई। इसे भारत का सबसे बड़ा और एशिया में दूसरे नंबर का सबसे बड़ा वेश्यालय कहा जाता है।

भारत में 10 साल गुजारने के बाद उसने वापस जाकर अपने अनुभव बांटे। आइए आप भी एक वेश्यालय को उनकी नजरों से देखने की कोशिश कीजिए।

गुड्डी उस वक्त 11 साल की थी जब पश्चिम बंगाल में उसके घर के पास रहने वाला पड़ोसी उसके घरवालों को राजी करके उसे मुंबई ले आया। शख्स ने गुड्डी के घरवालों और यहां तक की गुड्डी से भी यही कहा था कि वह उसे मुंबई में एक अच्छी नौकरी दिलवाएगा। गरीब घर में पैदा हुई गुड्डी काम के लालच में खुशी-खुशी उसके साथ मुंबई आ गई।

उस वक्त तक गुड्डी भी नहीं जानती थी कि काम की तलाश उसे भारत की सबसे ‘बदनाम’ जगह पर लाकर बैठा देगी। इसके बाद जब उससे कहा गया कि उसे लोगों के साथ ‘सोना’ है और ‘उस काम’ के बदले पैसे मिलेंगे तो उसने साफ मना कर दिया। उसने कह दिया कि वह यह काम नहीं कर सकती।

इसपर जो शख्स उसे वहां लेकर पहुंचा था उसने उस कोठे की मालकिन के साथ मिलकर उसे खूब मारा। उसकी पिटाई करने वालों में उस मालकिन की बेटी और उसका कस्टमर भी शामिल था। पहली रात उसपर इतना सितम किया गया कि वह अगले तीन महीने तक हॉस्पिटल के बेड से उठ नहीं पाई।

पर, गुड्डी की कहानी एक अकेली लड़की की कहानी नहीं है। यह तो एक आइना है जिससे हमें वहां काम करने वाली लगभग 20 हजार सेक्स वर्कर्स की जिंदगी के बारे में पता लग जाना चाहिए।

इस एरिया को बनाने में भारत पर राज करके गए अंग्रेजों का हाथ है। यह एरिया को अंग्रेजी फोजियों के लिए ही 150 साल पहले बनाया गया था। खैर यह एक अकेला वेश्यालय नहीं है जिसे अंग्रेजों ने बनाया हो। अपने फौजियों के लिए वह भारत के कई कोनों पर इस ‘नर्क को जन्म’ दे चुके थे।

थॉमसन 2002 में मुंबई आई और फिर 2012 तक यही रहीं। अपने अनुभव के आधार पर वह कहती हैं, ‘वे उसे तोड़ने के लिए बलात्कार करते हैं।’

इतना वक्त यहां बिताने के बाद थॉमसन इस नतीजे पर पहुंची कि 150 से ज्यादा सालों बाद भी कुछ नहीं बदला है। जिस वक्त वह वहां गई वहां एक लड़की को बिस्तर तक ले जाने के लिए लगभग 500 रुपए देने पड़ते थे। वहीं थॉमसन के बताया कि 12 से 16 साल तक की लड़कियों के रेट 2 हजार तक थे। वहीं वर्जिन लड़कियों की तो खुलेआम नीलामी होती थी।

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